नितीश की कश्ती पार लगाएंगे मांझी
जीतन राम मांझी अब नाम के ही नहीं काम
के भी मांझी हैं --- समुद्र की लहरों में कश्ती का संतुलन बनाये रखना किसी भी मांझी
के लिए जितना चुनौती भरा होता है ---ठीक
वैसी ही चुनौती इस मांझी के सामने
नितीश की कश्ती को मोदी लहर से बचा कर
सुरक्षित आगे ले जाने की है --- हालांकि नितीश की कश्ती में सवार ज़्यादातर
मुसाफिर मोदी की लहर में डूब चुके हैं --- लेकिन जो बचे हैं उन्हीं के साथ कश्ती
को 2015 तक खेते रहना है --- इस कठिन सफर के लिए नितीश
ने मांझी पर दांव लगाकर अपनी डूबती कश्ती को बचाने की आखिरी कोशिश की है --- जीतन
राम मांझी का नाम बिहार की सियासत में यूं तो पुराना है, लेकिन बतौर
मुख्यमंत्री उनकी तोजपोशी निश्चित तौर पर किसी चमत्कार से कम नहीं होगा. कांग्रेस
पार्टी से सियासत की शुरुआत करने वाले मांझी पहली बार 1980 में बिहार
विधानसभा के सदस्य चुने गए और तीन साल बाद बिहार सरकार में उप मंत्री भी बने,
लेकिन
इन 35 सालों में उनका राजनीतिक कद कभी भी इतना बड़ा नहीं रहा है कि उन्हें
कभी सीएम बनने वाले नेता के तौर पर देखा गया हो.एक खेतिहर मज़दूर परिवार में जन्म
लेने वाले मांझी का इस पद पर पहुंचना किसी करिश्मे से कम नहीं होगा. जीतन राम मांझी
का जन्म 6 अक्टूबर 1944 को गया जिले के मकहार गांव में हुआ.
रामजीत राम मांझी के घर पैदा होने वाले जीतन राम मांझी ने स्नातक तक की पढ़ाई की
है. जीतन राम 35 साल पहले यानी 1980 में बिहार
विधानसभा के लिए चुने गए. बीच में 1990 से 1996 तक वह विधानसभा
के सदस्य नहीं रहे, इसके अलावा हमेशा वे विधानसभा की शोभा बढ़ाते रहे हैं. 1983 से 1985 तक बिहार सरकार
में उप मंत्री और 1985 से 1988 तक राज्य मंत्री
रहे. 1998 से 2000 तक राबड़ी देवी सरकार में राज्य मंत्री रहे. 2008
से
नीतीश कुमार की मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री हैं. जीतन राम मांझी दलित समाज से
आते हैं और इस चुनाव में उन्होंने गया (सुरक्षित ) लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था,
लेकिन
वह तीसरे स्थान पर रहे थे. इस समय जीतन राम मांझी नीतीश सरकार में एससी/एसटी
वेलफेयर मिनिस्टर हैं. मांझी की कहानी किसी फ़िल्मी स्टोरी से कम नहीं है . गरीब घर में पैदा हुए , बाल
मज़दूरी किया . क्लर्क की नौकरी की , और अब सीएम . देश का पीएम एक चाय बेचने वाला होगा तो बिहार का
सीएम बालमज़दूरी कर जीवन की लड़ाई लड़ने वाला शख्स . इसे मैं सिर्फ इत्तेफ़ाक़ मानने को तैयार नहीं
हूँ . 16 मई
को दोपहर बाद से ही नितीश ने इस पूरे एपिसोड की स्क्रिप्ट लिखनी शुरू कर दी थी . दरअसल मोदी के सबसे मुखर विरोधियों
में नितीश सबसे आगे खड़े रहे हैं .
तमाम विरोधों के बावजूद मोदी न सिर्फ पूर्ण बहुमत से जीत कर आये बल्कि नितीश को
नितीश के घर में घेर कर मारा .
नितीश इस झटके को शायद बर्दाश्त नहीं कर पाये . राजनितिक फैसले लेने में
माहिर नितीश ने वक्त का इतेमाल अपने पक्ष में करने की पूरी कोशिश की है . नितीश ने मोदी को जवाब देने के साथ
साथ दलित कार्ड का मास्टरस्ट्रोक खेल दिया है . नितीश को उम्मीद है की मांझी महादलितों को जेडीयू की कश्ती में फिर
खिंच लाएंगे .
हालांकि नितीश के पास बिहार में लम्बे अर्से बाद एक मुस्लिम सीएम बनाने का ऑप्शन
था . लेकिन एक बार
फिर नितीश ने मुसलामानों को सिर्फ वोट बैंक ही समझा . नितीश चाहते तो मुस्लिम सीएम और दलित डिप्टी सीएम बनाकर एक बेहतरीन
विनिंग कॉम्बिनेशन बना सकते थे .
लेकिन इस बेहतरीन मौके को नितीश ने गँवा दिया .
very informative writeup..hope more from you in future..best wishesh..
ReplyDeleteTHANX
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