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Thursday, 22 May 2014

मोदी सरकार के मंत्रालयों की चुनौतियां


गृह मंत्रालय की चुनौतियां
1.       राज्यों के साथ बेहतर संबंध रखना होगा
2.       कश्मीर में 370 पर आम सहमति बनाना होगा
3.       राम मंदिर मुद्दे पर आम सहमति बनाना होगा
4.       आतंकवाद  और एनसीटीसी जैसे मसलों पर राज्यों के साथ मिलकर सख्त कानून बनाना
5.       पूर्वोत्तर राज्यों में अलगाव वादियों से बात बातचीत कर शान्ति कायम करना होगा
6.       बांग्ला देशी घुसपैठ के मसले पर कड़ा रुख अपनाना होगा
7.       नक्सलवाद से निबटना बड़ी चुनौती होगी
8.       सीबीआई की निष्पक्षता बनाये रखना बड़ी चुनौती होगी
9.       दाऊद इब्राहिम और दूसरे भगोड़े आतंकवादियों को भारत लाना बड़ी चुनौती होगी
10.   खुफिया विभाग को और बेहतर बनाना --साथ ही राज्यों और केंद्र की ख़ुफ़िया एजेंसियों के बीच तालमेल बना कर ख़ुफ़िया सूचनाओं का एक्सचेंज करना होगा
11.   तेलंगाना विभाजन के बाद दूसरे  छोटे राज्यों की मांग कर रहे लोगों की मांग पर ध्यान देना और समस्या का हल निकालना
12.   पैरामिलटरी फोर्सेस में बढ़ते असंतोष का हल ढूंढ़ना

रक्षा मंत्रालय की चुनौतियां
1.       रक्षा आधुनिकीकरण की रफ्तार बढ़ाने के साथ ही खरीद योजनाओं के चुस्त प्रबंधन. और बिचौलियों को दूर रखना
2.       सेना का आधुनिकीकरण और सेना को ज़्यादा सक्षम बनाना
3.       सेना में बढ़ते भ्रष्टाचार पर लगाम लगाना ।  वीआईपी हेलीकाप्टर , आदर्श घोटाला , सुकना ज़मीन विवाद , जैसे कई ऐसे मामले हैं जिसकी वजह से पिछली सरकार में सेना की साख पर सवाल खड़े हुए हैं ।  सेना को अपनी खोई साख वापस लाना रक्षा मंत्रालय की बड़ी चुनौती होगी
4.       स्वदेश निर्मित हथियारों का निर्माण करने में रक्षा मंत्रालय और डीआरडीओ को बड़ा रोल निभाना होगा ।  मोदी अपनी चुनावी रैलियों के दौरान स्वदेश निर्मित हथियारों की बात कह चुके हैं
5.       हादसों से जूझ रही नौसेना और  वायुसेना  को बेहतर और मज़बूत बनाना बड़ी चुनौती
6.       बांगला देश , भारत पाक सीमा और चीन से लगे सरहद पर घुसपैठ से निबटना , सीज़ फायर के उल्लंघन का मुंहतोड़ जवाब देना
7.       हिन्द महासागर में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के रक्षामंत्रालय और विदेश मंत्रालय दोनों को मिलकर काम करना होगा
8.       पूर्व सेना अध्यक्ष जनरल वी के सिंह ने सेना अध्यक्ष रहते तत्कालीन रक्षा मंत्रालय पर कई गंभीर आरोप लगाए थे।  अब वी के सिंह खुद सांसद हैं और उन्हीं की पार्टी की सरकार है।  इसलिए मोदी सरकार के रक्षा मंत्रालय से उम्मीद और चुनौतियां पहले से कहीं ज़्यादा है

कानून मंत्रालय की चुनौतियां
1.       बड़े स्तर पर जुडिशियल रिफार्म लाना होगा I
2.       देश की सुस्त पड़ी अदालती वयवस्था के काम काज में तेज़ी लाना और पेंडिंग केसों के जल्द निबटारे के लिए अदालतों और जजों की संख्या बढ़ाना बड़ी चुनौती ।  इस समय देश भर की अदालतों में लगभग 3 करोड़ मामले फैसले का इंतज़ार कर रही हैं . हाई कोर्ट में 23,000 रेप केस पेंडिंग हैं 
3.       ज़्यादा से ज़्यादा फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन करना
4.       जुडिशियल एकॉउंटिबिलिटी बिल और जुडिशियल अपॉइंटमेंट कमीशन बिल संसद से पास करवाना
5.       जनलोकपाल कानून को प्रभावी ढंग से लागू करना और आम लोगों से जुड़े एंटी ग्राफ्ट बिल को संसद से पास कराना
6.       आतंकवाद से निबटने के लिए बेहतर और प्रैक्टिकल कानून बनाना
7.       आम लोगों के लिए अदालती खर्चे को उनकी पहुँच में लाना

एचआरडी मिनिस्ट्री की चुनौतियां
1.       बेरोज़गार युवाओं को रोज़गार परक शिक्षा से जोड़कर स्किल डेवलपमेंट के ज़रिये उन्हें रोज़गार के लायक बनाना
2.       उच्च शिक्षण संस्थानों को आधुनिक और विश्वस्तरीय बनाना
3.       हायर एजुकेशन पर विशेष ध्यान देना और रिसर्च के फिल्ड में छात्रों को ज़्यादा से ज़्यादा प्रोत्साहन देना
4.       राइट टू एडुकेशन को ज़मीनी स्तर तक ले जाना ।  गाँव और दूर दराज़ के इलाकों में अब भी हज़ारों बच्चे स्कूल नहीं पहुँच पा रहे
5.       प्राइमरी स्तर पर स्कूलों को बेहतर बनाना ।  और स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं पर विशेष ध्यान देना 
6.       मदरसों को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ना।   दीनी तालीम के साथ स्किल डेवेलपमेंट  कोर्स को भी जोड़ना।  मुस्लिम बुद्धिजीवियों को मदरसा में ऐसा करने के लिए एक प्लेटफार्म पर लाना।  मोदी ने अपनी चुनावी भाषण के दौरान कहा था वो एक हाथ में कुरआन और दूसरे हाथ में कम्प्यूटर देना चाहते हैं
7.       विदेशी यूनिवर्सिटियां  भारत में हाल के दिनों में बड़ी संख्या में आकर्षित हो रही हैं।  इन युनिवर्सिटियों के लिए बेहतर मॉनिटरिंग सिस्टम बनाना।  ताकि शिक्षा के व्यवसायीकरण पर रोक लगाई जा सके और हायर एजुकेशन को आम छात्रों की पहुँच तक लाया जा सके
8.       शिक्षा के भगवाकरण के आरोपों से पार पाना मौजूदा एचआरडी मिनिस्ट्री के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी।  वाजपयी सरकार में एचआरडी मिनिस्टर रहे मुरली मनोहर जोशी पर शिक्षा के भगवाकरण करने के कई गंभीर आरोप लगे थे
9.       मिड डे मील योजना में क्वालिटी का विशेष ध्यान रखना।  राज्यों के साथ तालमेल कर योजना को और बेहतर ढंग से लागू करना।  योजना में चल रहे भ्रष्टाचार पर काबू पाना

विदेश मंत्रालय की चुनौतियां
1.       विदेश मंत्रालय के सामने सबसे बड़ी चुनौती  पडोसी मुल्कों के साथ बेहतर रिश्ता रखना होगा ।  मोदी ने इसकी शुरुआत सार्क देशों के प्रतिनिधियों को शपथग्रहण समारोह में शिरकत की दावत देकर कर दी है .
2.       चीन से आर्थिक और सामरिक मामलों में ताल मेल बनाना बड़ी चुनौती है।  खासकर तब जब चीन की तरफ से समय समय पर एलएसी और अरुणचल विवाद की ख़बरें रिश्ते में उतार चढ़ाव लाती रहती हैं
3.       अपने हितों को सर्वोपरि रखते हुए अमेरिका से रिश्तों में संतुलन बनाये रखना बड़ी चुनौती होगी
4.       मोदी सरकार में पाकिस्तान के साथ भारत के  रिश्तों पर दुनिया भर की नज़र है।  आतंकवाद , सीमा विवाद  , वक़्त वक़्त पर पाकिस्तान की तरफ से सीज़फायर के उल्लंघन से उपजे तवाव के बीच और  चीन पाक की नज़दीकियों के बावजूद पाकिस्तान  से रिश्ते सामान्य बनाये रखना मोदी सरकार की सबसे बड़ी चुनौती होगी।  हालांकि मोदी ने नवाज़ शरीफ को शपथ ग्रहण समारोह में शिरकत की दावत देकर ये मैसेज देने की कोशिश की है की भारत एक बेहतर पडोसी की अपेक्षा रखता है
5.       कश्मीर विवाद पर भारत को मज़बूत रुख रखना होगा।  और दुनिया को ये बताना होगा की कश्मीर पर पाकिस्तान का दावा गलत है
6.       संयुक्त राष्ट्र में भारत को स्थायी सदस्यता दिलाना भी मोदी सरकार के लिए बड़ी चुनौतियों में से एक है
7.       डीएमके और एमडीएमके जैसी पार्टियों का तमिल मामले पर श्रीलंका से नज़दीकी का विरोध मोदी सरकार को लगातार झेलना पड़ेगा । इन विरोधों  के बीच तमिलों के हितों का ख्याल रखते हुए आगे बढ़ना होगा
8.       हिन्द महासागर में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए भारत को संयुक्त राष्ट्र में मज़बूती से अपनी आवाज़ रखनी होगी
9.       रूस और दूसरे मित्र देशों के साथ रिश्तों में और गर्माहट लानी होगी। 
10.   आतंकवाद से लड़ने के लिए बेहतर रिश्तों वाले पडोसी मुल्कों बांग्लादेश और नेपाल से रिश्तों को मज़बूत बनाये रखना बड़ी चुनौती होगी।  क्योंकि चीन दोनों देशों से नज़दीकी बनाने की तरफ कदम बढ़ा रहा है
11.   खाड़ी और दूसरे देशों में काम करने वाले भारतीयों  के हितों और उनके मानवाधिकार का उल्लंघन न हो , इसके लिए विदेश मंत्रालय को एक बेहतर नीति अपनानी होगी , डेनमार्क और देवयानी मामले में विदेश मंत्रालय के रुख ने भारत की कमज़ोरी दर्शायी थी

टेलीकॉम मिनिस्ट्री की चुनौतियां
1.       यूपीए सरकार में हुए घोटालों के लगे दाग को मिटा कर आगे बढ़ना
2.       स्पेक्ट्रम आवंटन में पारदर्शिता लाना
3.       टेलीकॉम मिनिस्ट्री को घाटे से उबारना
4.       कंपनियों के मर्जर पर बेहतर पॉलिसी बनाना
5.       प्रो कंजूमर पॉलिसी अपनाना
6.       ट्राई की सिफारिशों को लागू करते हुए ग्राहकों के हक़ में फैसले लेना

वित्त मंत्रालय की चुनौतियां
1.       बढ़ती महंगाई को थामना नयी सरकार की बड़ी चुनौती  : बेमौसम बरसात और अल नीनो के प्रभाव से देश के कुछ हिस्सों में सूखा पड़ने की आशंका तथा खुदरा मुद्रास्फीति की रफ्तार को देखते हुए केंद्र की नयी सरकार के लिए अन्य मुददों के साथ साथ महंगाई पर रोक लगाना और खाद्य पदार्थों की कीमतों को आम जनता की पहुंच में लाना प्रमुख चुनौती होगी।

2.       सबसे अहम चुनौती आर्थिक विकास को पटरी पर लाना है। जिससे कि महंगाई के साथ-साथ नए निवेश और रोजगार के ज्यादा से ज्यादा अवसर पैदा हो सके।


3.       ऎसा बजट पेश करना जो राजकोषीय घाटे पर लगाम लगाए : डांवाडोल स्थिति में चल रही वित्तीय स्थिति को और खराब होने से रोकने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ेगी। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का मार्च में खत्म हुए वित्तीय वर्ष मे पुर्ननिधारित राजकोषीय घाटा 4.6 प्रतिशत हासिल करने के लिए कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने खर्च में 13 अरब डॉलर की कटौती करने के साथ नए साल में 16 अरब डॉलर की सब्सिडी दी थी। अब उस मितव्ययिता को थामे रखना मुश्किल होगा।\

4.       चालू खाता घाटे को कम करना : पिछले वित्तीय वर्ष में जीडीपी के चालू खाता घाटा 4.8 प्रतिशत से दो प्रतिशत पर आ गया था और यह सोने के आयात पर प्रतिबंध लगाने के कारण हुआ था। सरकार ने सोने के आयात पर लगने वाली डयूटी में भारी इजाफा करने के साथ ही आयात पर काफी हद तक रोक लगा दी थी, लेकिन सरकार का यह कद लोगों को पसंद नहीं आया था क्योकि महंगाई से बचने के लिए और शादियों मे उपहार के तौर पर देने के लिए सोने में पैसा लगाते हैं। सोने के आयात को लेकर सरकार के सख्त कदमों के चलते सोने की तस्करी बढ़ी जिसके चलते आंकड़ों पर संदेह होता है। भाजपा ने वादा किया है कि सत्ता मे आते ही तीन महीने के अंदर वह सोने के आयात पर लगने वाले शुल्क का अध्ययन करेगी। शुल्क को हटाने से खरीददारों के चेहरो पर खुशी लौटने की उम्मीद है, लेकिन निवेशक शायद इससे खुश नहीं हों क्योंकि अगस्त में चालू खाता घाटे के चलते रूपए में रिकॉर्ड गिरावट दर्ज की गई थी। इसे नियंत्रित करने में भाजपा सरकार को काफी मशक्कत करनी पड़ेगी।


5.       महीनों से खाली पड़े दर्जन भर से ज्यादा अति महत्वपूर्ण पदों पर उपयुक्त लोगों की नियुक्ति की जाए। यह पद यूपीए सरकार के समय से खाली पड़े हैं। रिक्त पद भारतीय रिजर्व बैंक से लेकर, बीमा नियामक इरडा, भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई), पेंशन फंड नियामक पीएफआरडीए, टीडीसैट और बैंक में खाली हैं। ऐसे में नरेंद्र मोदी को अपने आर्थिक एजेंडे को रफ्तार देने के लिए सबसे पहले इन पदों पर लंबित पड़ी नियुक्तियों को निपटाना होगा।

6.    आरबीआई, एल नीनो से निपटने की चुनौती  : नई सरकार को एक नए दुश्मनएल नीनो से निपटना होगा। एल नीनो कम बारिश के लिए जिम्मेदार होता है। विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि एल नीनो के कारण भारतीय फसलें चौपट हो सकती हैं। जानकारों का कहना है कि जून-सितंबर में सामान्य से कम वर्षा के कारण फसल उत्पादन 0.50-0.90 प्रतिशत गिर सकता है जिससे महंगाई बढ़ने का खतरा रहेगा। पिछले साल अच्छे मॉनसून से कमजोर अर्थव्यवस्था को राहत मिली थी। वहीं, बढ़ती महंगाई के चलते केद्रीय बैंक आरबीआई के साथ नई सरकार के टकराव बढ़ सकते हैं। आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन महंगाई को रोकना अपनी प्राथमिकताओं से एक मानते हैं। आरबीआई वार्षिक उपभोक्ता मूल्य वृद्धि को जनवरी 2016 तक वर्तमान 8.1 प्रतिशत से 6 प्रतिशत लाना चाहता है। ऎसा करने के लिए ब्जाद दरों में बढ़ोतरी की जा सकती है। सितंबर से अबतक आरबीआई तीन बार दरें बढ़ा चुका है।


7.       निजी निवेश को दोबारा उठाना   : बाजार मोदी से काफी उम्मीद लगाए हुए है कि गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने जिस तरह उन्होंने अपने प्रदेश में निवेश को बढ़ावा दिया, ठीक उसी तरह वह देश के लिए भी कुछ ऎसा करेंगे। हालांकि, विश्लेषकों का मानना है कि देशभर में अपने प्रदेश का मॉडल लागू करना मोदी के लिए आसान नहीं होगा क्योंकि राज्यों का ऎसे मामलों में दखल काफी होता है। के्रडिट सुइस्से के मुताबिक, सिर्फ एक-तिहाई मामलों में ही केंद्र सरकार दखलअंदाजी कर सकता है। भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में वादा किया है कि वह उन क्षेत्रो में नौकरशाही की दखलअंदाजी को कम करेगी जहां विदेशी पूंजी निवेश और नई नौकरियों को बढ़ावा मिल सके। हालांकि, पार्टी ने कहा कि वह रिटेल में एफडीआई को मंजूरी नहीं देगी। देश की अर्थव्यवस्था में पूंजी निवेश का 35 प्रतिशत हिस्सा है। लेकिन, पिछले वित्तीय वर्ष में समय पर निवेशों को मंजूरी नहीं देने के कारण इसमें ना के बरादर बढ़ोतरी देखी गई।

8.       सरकारी बैंकों को दोबारा खड़ा करना  : सरकारी बैंकों द्वारा दिए गए खराब कर्जो को भी पटरी पर लाना भी नई सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती होगी। इन खराब कर्जो का प्रतिशत करीब 10 प्रतिशत है। इनमें से अधिकतर कर्ज आधारभूत परियोजनाओं को दिए गए, जिसके चलते अब कर्ज देने में बैंक चौकन्ने हो गए हैं।अंतरिम बजट मे बैंकों के लिए अगल से 112 अरब रूपए रखे गए हैं, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि बैंकों को और भी आर्थिक मदद की जरूरत पड़ेगी और नई सरकार के लिए यह एक मुश्किल काम होगा।

9.       टैक्स का सरलीकरण कर जीएसटी लागू करना ।
10.   डीज़ल , पेट्रोल और रसोई गैस के दाम काबू में रखना
11.   डॉलर के मुकाबले रूपये में मज़बूती लाना
12.   विदेशों में जमा काला धन को वापस लाना

Monday, 19 May 2014

नितीश की कश्ती पार लगाएंगे "मांझी"


नितीश की कश्ती पार लगाएंगे मांझी


जीतन राम मांझी अब नाम के ही नहीं काम के भी मांझी हैं --- समुद्र की लहरों में कश्ती का संतुलन बनाये रखना किसी भी मांझी के लिए जितना चुनौती भरा होता है ---ठीक  वैसी ही चुनौती  इस मांझी के सामने नितीश की कश्ती को मोदी लहर से बचा कर  सुरक्षित आगे ले जाने की है --- हालांकि नितीश की कश्ती में सवार ज़्यादातर मुसाफिर मोदी की लहर में डूब चुके हैं --- लेकिन जो बचे हैं उन्हीं के साथ कश्ती को 2015  तक खेते रहना है --- इस कठिन सफर के लिए नितीश ने मांझी पर दांव लगाकर अपनी डूबती कश्ती को बचाने की आखिरी कोशिश की है --- जीतन राम मांझी का नाम बिहार की सियासत में यूं तो पुराना है, लेकिन बतौर मुख्यमंत्री उनकी तोजपोशी निश्चित तौर पर किसी चमत्कार से कम नहीं होगा. कांग्रेस पार्टी से सियासत की शुरुआत करने वाले मांझी पहली बार 1980 में बिहार विधानसभा के सदस्य चुने गए और तीन साल बाद बिहार सरकार में उप मंत्री भी बने, लेकिन इन 35 सालों में उनका राजनीतिक कद कभी भी इतना बड़ा नहीं रहा है कि उन्हें कभी सीएम बनने वाले नेता के तौर पर देखा गया हो.एक खेतिहर मज़दूर परिवार में जन्म लेने वाले मांझी का इस पद पर पहुंचना किसी करिश्मे से कम नहीं होगा. जीतन राम मांझी का जन्म 6 अक्टूबर 1944 को गया जिले के मकहार गांव में हुआ. रामजीत राम मांझी के घर पैदा होने वाले जीतन राम मांझी ने स्नातक तक की पढ़ाई की है. जीतन राम 35 साल पहले यानी 1980 में बिहार विधानसभा के लिए चुने गए. बीच में 1990 से 1996 तक वह विधानसभा के सदस्य नहीं रहे, इसके अलावा हमेशा वे  विधानसभा की शोभा बढ़ाते रहे हैं.  1983 से 1985 तक बिहार सरकार में उप मंत्री और 1985 से 1988 तक राज्य मंत्री रहे. 1998 से 2000 तक राबड़ी देवी सरकार में राज्य मंत्री रहे. 2008 से नीतीश कुमार की मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री हैं. जीतन राम मांझी दलित समाज से आते हैं और इस चुनाव में उन्होंने गया (सुरक्षित ) लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था, लेकिन वह तीसरे स्थान पर रहे थे. इस समय जीतन राम मांझी नीतीश सरकार में एससी/एसटी वेलफेयर मिनिस्टर हैं. मांझी की कहानी किसी फ़िल्मी स्टोरी से कम नहीं है . गरीब घर में पैदा हुए , बाल मज़दूरी किया .  क्लर्क की नौकरी की , और अब सीएम .  देश का पीएम एक चाय बेचने वाला होगा तो बिहार का सीएम बालमज़दूरी कर जीवन की लड़ाई लड़ने वाला शख्स . इसे मैं  सिर्फ इत्तेफ़ाक़ मानने को तैयार नहीं हूँ .  16 मई को दोपहर बाद से ही नितीश ने इस पूरे एपिसोड की स्क्रिप्ट लिखनी शुरू कर दी थी . दरअसल मोदी के सबसे मुखर विरोधियों में नितीश सबसे आगे खड़े रहे हैं . तमाम विरोधों के बावजूद मोदी न सिर्फ पूर्ण बहुमत से जीत कर आये बल्कि नितीश को नितीश के घर में घेर कर मारा . नितीश इस झटके को शायद बर्दाश्त नहीं कर पाये . राजनितिक फैसले लेने में  माहिर नितीश ने वक्त का इतेमाल अपने पक्ष में करने की पूरी कोशिश की है . नितीश ने मोदी को जवाब देने के साथ साथ दलित कार्ड का मास्टरस्ट्रोक खेल दिया है . नितीश को उम्मीद है की मांझी महादलितों को जेडीयू की कश्ती में फिर खिंच लाएंगे . हालांकि नितीश के पास बिहार में लम्बे अर्से बाद एक मुस्लिम सीएम बनाने का ऑप्शन था . लेकिन एक बार फिर नितीश ने मुसलामानों को सिर्फ वोट बैंक ही समझा . नितीश चाहते तो मुस्लिम सीएम और दलित डिप्टी सीएम बनाकर एक बेहतरीन विनिंग कॉम्बिनेशन बना सकते थे . लेकिन इस बेहतरीन मौके को नितीश ने गँवा दिया .

बिहार में मोदी की ये कैसी लहर?

बिहार में मोदी की ये कैसी लहर 


लोकसभा चुनावी नतीजों का विश्लेषण हर कोई अपने तरीके से कर रहा है I मोदी लहर सुनामी कहर हिंदुत्व की जीत जैसे नाम दिए जा रहे हैं I  ये सारी उपाधियाँ यूपी के नतीजों को देखते हुए पहली नज़र में सही भी लगती हैं I  लेकिन बिहार के नतीजों के विश्लेषण से पता चलता है की यहाँ न तो मोदी की लहर थी और न ही मोदी कहर I बिहार में बीजेपी एलजेपी और आरएलएसपी गठबंधन को मिलाकर कुल 38.8 फीसदी वोट मिले हैं जबकी गैर एनडीए दलों यानी आरजेडी कांग्रेस जेडीयू एनसीपी और बीएसपी को लगभग 49 फीसदी वोट मिले हालंकि नतीजे एनडीए के हक़ में हैं और 31 सीटों के साथ एनडीए नंबर वन पर है जबकि गैर एनडीए दलों के पास सिर्फ 9 सीटें ही हैं जिनमें जेडीयू  की भी 2 सीटें शामिल हैं  पहली नज़र में देखने पर ये आंकड़े बिहार में मोदी लहर या कहर जैसे ही दिखेंगे  लेकिन जिन आंकड़ों को देख कर मोदी लहर की बात की जा रहे है वही आंकड़े इस लहर को खारिज करती है I  बिहार में 40 सीटों पर हुए चुनाव में एनडीए दलों को कुल 38.8 फीसदी वोट मिले जबकि गैर एनडीए दलों जेडीयू आरजेडी कांग्रेस लेफ्ट एनसीपी को लगभग 49 फीसदी वोट मिले I यानी गैर  एनडीए दलों को एनडीए  से 10 फीसदी ज़्यादा वोट मिले I एनडीए और यूपीए से अलग अपने बूते पर चुनाव लड़ने वाली जेडीयू को 2 सीटें मिलीं जबकि 4 सीटों पर पार्टी नंबर 2 पर रही I  गैर एनडीए दलों यानी जेडीयू आरजेडी और कांग्रेस अगर एक प्लेटफार्म पर चुनाव लड़ती तो नतीजे कुछ और ही होते जिन सीटों पर बीजेपी और एलजेपी के प्रत्याशी विजयी रहे हैं उन सीटों में से 18 ऐसी सीटें हैं जहां बीजेपी और एलजेपी उम्मीदवारों की जीत सिर्फ गैर एनडीए वोटों के बिखराव की वजह से हुई  है उन 18 सीटों का ज़िक्र करना यहां बेहद ज़रूरी है -- औरंगाबाद बेगुसराई दरभंगा गया जहानाबाद जमुई झंझारपुर खगडिया मधुबनी महाराजगंज मुंगेर पश्चिम चंपारण पाटलिपुत्र समस्तीपुर सारण सासाराम उजीयारपुर और  वैशाली  I  ये सभी ऐसी 18 सीटें हैं जहां बीजेपी और एलजेपी उम्मीदवारों की जीत सिर्फ और सिर्फ गैर एनडीए दलों के बीच बंटे वोटों की वजह से हुई है I जो लोग मुसलिम यादव या महादलित वोटरों में मोदी की हिस्सेदारी बता कर एक सेकुलर और सर्वमान्य छवि बनाकर इस जीत को और बड़ा बनाने की कोशिश कर रहे हैं उन्हें पहले इन 18 सीटों का गुना भाग कर लेना चाहिए अगर एनडीए के मुकाबले  आरजेडी जेडीयू और कांग्रेस  मिलकर चुनाव लड़ी होती तो आंकड़े इस तरह होते -- आरजेडी + जेडीयू + कांग्रेस + एनसीपी + लेफ्ट मिलकर कुल 27 सीटें जबकि बीजेपी + एलजेपी + आरएलएसपी मिलकर कुल 13 सीटें I अब मोदी लहर कहर सुनामी की बात करने वाले हमें या इस देश को समझा दें की क्या वाकई ये मोदी लहर से उपजी जीत है कुछ लोग इसे हाइपोथेटिकल सिचुएशन या परिकल्पनाओं की कहानी कह सकते हैं I  लेकिन क्या इस बात में भी उन्हें कोई शक होगा की बिहार में मोदी की जीत सिर्फ और सिर्फ गैर एनडीए दलों के बिखराव का नतीजा है I यूपी में मोदी के सारे लहर और अमित शाह का चुनावी मैनेजमेंट कबूल है  लेकिन बिहार में तो न अमित शाह का मैनेजमेंट था और ना ही यहां के लोग किसी लहर में दिखे उनके पास मोदी के मुकाबले नितीश का विकास मॉडल था  लेकिन लोकतंत्र में चुनाव के बाद किसी भी पार्टी को मिलने वाले नंबर ही सबसे अहम होते हैं  और इस बार बिहार की जनता ने ये नंबर एनडीए की झोली में डाला है I इसलिए इन नंबरों का सम्मान किया जाना चाहिए I और किसी राग द्वेष के बिना सबका का भला और सबका विकास होना चाहिए I